The right words at the right moment

 

                                  संयम रखना

रात की ट्रेन थी। डिब्बे में हल्की-हल्की रोशनी, बाहर दौड़ते पेड़ और भागते मैदान।

एक युवती अपना बैग संभालते हुए डिब्बे में दाखिल हुई। उसने अपना टिकट देखा — सीट नंबर 24, विंडो साइड।

लेकिन उस सीट पर पहले से एक अधेड़ उम्र का आदमी जम कर बैठा था — अखबार फैलाए, जूते उतारे।

युवती ने विनम्रता से मुस्कुराते हुए कहा — "सर, माफ़ करिएगा.. मुझे लगता है यह मेरी सीट है।"

आदमी ने अखबार नीचे किया। भौंहें तन गईं।

"ध्यान से देखो पहले! यह मेरी सीट है। तुम्हें ठीक से पढ़ना भी नहीं आता क्या?!"

उसकी आवाज़ पूरे डिब्बे में गूँजी। कुछ लोगों ने गर्दन उठाकर देखा।

लड़की ने कुछ नहीं कहा।

उसने चुपचाप उसका टिकट एक नज़र देखा, फिर अपना टिकट देखा — और बिना एक भी शब्द कहे, शांति से उसके बगल में खड़ी हो गई। न झगड़ा, न बहस, न आँसू।

बस.. एक गहरी, रहस्यमयी चुप्पी।

ट्रेन चल पड़ी। स्टेशन पीछे छूटते गए।

कोई दस मिनट बाद, जब आदमी दोबारा अखबार में डूब चुका था, युवती ने बेहद शांत, लगभग मीठी आवाज़ में कहा —

"सर, एक बात बताऊँ?"

आदमी ने ऊपर देखा।

"आप गलत सीट पर नहीं बैठे हैं..आप गलत ट्रेन में बैठे हैं। यह ट्रेन कोलकाता जा रही है। आपकी टिकट — मुंबई की है।"

एक पल के लिए समय जैसे रुक गया।

आदमी का चेहरा पहले सफ़ेद पड़ा, फिर लाल। टिकट हाथ में काँपने लगा। शब्द गले में ही अटक गए।

और वह लड़की? उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न व्यंग्य। बस एक शांत, सौम्य मुस्कान।

कुछ लोग समझते हैं कि ऊँची आवाज़ ही ताकत है। लेकिन असली ताकत वह है जो चुप रहकर भी जीत जाए।

संयम कोई कमज़ोरी नहीं — यह वह हथियार है जो सबसे सटीक वक्त पर, सबसे गहरी चोट करता है।

और रही बात चिल्लाने की तो.. अगर शोर से ही सब कुछ हल होता, तो गधों का राज होता पूरी दुनिया में। 😄

शांत रहिए। सही समय पर सही बात — यही असली बुद्धिमानी है।



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